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यूपी की बहू थीं दिल्ली की शीला, बार-बार नहीं पैदा होती ऐसी महिला!

नई दिल्ली: मौत से किसकी यारी आज तेरी तो कल मेरी बारी है! इन्ही कथनों को सच साबित कर शीला दीक्षित इस दुनिया को छोड़ चलीं, और पीछे छोड़ गई अपनी यादें, अपने चाहने वालों के आंखों में गम। नम आंखों के साथ जो भी अंतिम दर्शन को पहुंचा उनके साथ बिताए पल को बयां करने से रोक नहीं सका। शीला के धुरविरोधी दिल्ली बीजेपी अध्यक्ष मनोज तिवारी भी कहते हैं, मैं जब आखिरी बार मिला तब भी वह उसी बड़कपन के साथ पेश आईं, वह सिर्फ एक नेता या पूर्व सीएम नहीं एक असमान्य व्यक्तिव की मालकिन थीं।

शीला दीक्षित महज एक नाम नहीं बल्कि सियासी सिनेमा का वो पात्र थीं, जिन्होंने अपने 35 साल के सियासी सफर में किसी भी सियासी विरोधी की व्यक्तिगत आलोचना से बचती रहीं। हां यह सच है कि सभ्य और सैम्य व्यक्तित्व की मालकिन शिला ने सियासी सफर में प्रतिद्वदियों को अपने पैरों पर खड़ा नहीं होने दिया, लेकिन फिर भी पक्ष-विपक्ष सभी के दिलों में उनके लिए श्रद्धा का भाव रहा। सियासत के दलदल में ऐसे चेहरे गिने-चुने ही हुए जिनके सामने विरोधी भी सम्मान का भाव रखते हैं। जिनसे मिलने में धुर-विरोधियों को भी घबराहट नहीं होती।

कांग्रेस पार्टी की वरिष्ठ नेताओं में से एक, 81 साल की शीला दीक्षीत का जन्म पंजाब के कपूरथला में हुआ। बचपन से ही लीडरशिप क्वालिटी रखने वालीं शीला ने दिल्ली के जीजस एण्ड मैरी स्कूल से प्रारम्भिक शिक्षा ली और आगे की पढ़ाई मिंराडा हाउस से करने के बाद प्राचीन इतिहास की पढ़ाई के लिए दिल्ली विश्व विद्यालय का रूख किया। इसी दौरान उनकी मुलाकात उत्तरप्रदेश के उन्नाव से कांग्रेस नेता उमा शंकर के आईएएस बेटे विनोद दीक्षित से हुई, जो बाद में उनके हमसफर बने। यही कारण है कि शिला उत्तर प्रदेश की बहू भी कही जाती हैं।

कहते हैं कि शीला दीक्षित दिल्ली विश्व विद्यालय से ही राजनीति में रुचि लेने लगी थी, जबकि शादी के बाद वह अपने ससुर उमा शंकर के सियासी काम-काज में हाथ बटाने लगीं। हालांकि शुरुआती दौर में उमाशंकर का कांग्रेस में कोई बड़ा कद नहीं था, लेकिन समय के साथ नेहरु परिवार से करीबियां बढ़ी और कांग्रेस पार्टी में उनके ससुर का कद भी उंचा हुआ। नेहरु परिवार से नजदीकियों का नतीजा था कि उमाशंकर इंदिरा गांधी सरकार में गृहमंत्री बने। और जैसे-जैसे उनके ससुर का सियासी कद बढ़ा, शीला भी उनसे सियासी गुर सीखती गईं।

अपने सियासी सफर के पहले पड़ाव पर शिला दीक्षित संसदिय चुनाव में उत्तरप्रदेश के कन्नोज से उतरी और 1984 से 1989 तक सांसद रही। इस दौरान उन्हें केंद्र में मंत्री की जिम्मेदारी भी मिली। वह संसदीय कार्यों की राज्य मंत्री रहीं और बाद में, प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री के तौर पर अपनी सेवाएं दी। इसी दौरान शिला ने संयुक्त राष्ट्र में महिला आयोग की ओर से भारत का प्रतिनिधित्व किया।

अब शिला दीक्षित गांधी-नेहरू परिवार के काफी करीब थी, जिसका फायदा उन्हें साल 1998 में मिला। जब दिल्ली के लिए चेहरा तलाश रही कांग्रेस पार्टी ने शिला को सीएम उम्मीदवार बनाया। हालांकि ये वो दौर था जब शिला को बाहरी बताते हुए दिल्ली में विरोध का सामना करना पड़ा। लेकिन चुनाव में मिली जीत के बाद शिला ने जनता पर ऐसा जादू चलाया कि 1998 से लेकर 2013 तक सीएम की कुर्सी उनसे दूर नहीं रही।, हालांकि ये और बात है कि जिस साल शिला पहली बार मुख्यमंत्री बनी, उसी साल उन्हें लोकसभा चुनावों में हार का सामना करना पड़ा था। लेकिन इसके बाद भी रिकॉर्ड समय तक दिल्ली की सीएम बनी रही।

लेकिन साल 2013 में दिल्ली की सियासत में अरविंद केजरीवाल की एंट्री और भ्रष्टाचार की आग में झूलस रही कांग्रेस को मुंह की खानी पड़ी। तब ऐसी चर्चा भी जोरों पर थी कि अब शीला सियासी सफर थम गया, लेकिन उन्होंने इसे गलत साबित किया, क्योंकि जिस तरह से 2019 लोकसभा चुनावों में वापसी की उसने सभी को चौका दिया। इतना ही नहीं वह जीवन के अंतिम पड़ाव पर भी दिल्ली कांग्रेस का अध्यक्ष रहीं। इसके अलाव वह केरल की राज्यपाल के तौर पर भी अपनी सेवाएं दे चुकी हैं। सियासी गलियारों में कई अहम पद पर अपनी सेवाएं दे चुकी शीला ने दिल्ली वालों के लिए और खासकर महिला उत्थान के लिए कई ऐसे सराहनीय फैसले किए, जिसकी वजह से लोगों के बीच उनकी एक भिन्न छवि बनी। जिन्हें शायद लोग कभी नहीं भूल पाएंगे।

शीला का निधन 20 जुलाई 2019 को दिल्ली के एक अस्ताल में करीब दोपहर 3 बजकर 55 मिनट पर हुआ। लंबे समय से बीमार चल रही शिला को मौत से पहले शनिवार सुबह उल्टी हुई, जिसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया। यहां इलाज के दौरान उन्हें दिल का दौरा पड़ा, जिसके बाद उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया, लेकिन शायद आज उनका जाना तय था, लिहाजा चिकित्सकों के सारे जुगत धरे के धरे रह गए, और भारतीय राजनीत के एक और सितारे की आंखे हमेशा-हमेशा के लिए बंद हो गई।

फिलहाल शीला का पार्थिव शरीर अंतिम दर्शन के लिए रखा गया, जहां सत्ता और विपक्ष के लगभग सभी दिग्गज नेता पहुंच रहे हैं। रविवार को अंतिम संस्कार से पहले उनका पार्थिव शरीर कांग्रेस मुख्यालय में होगा, जहां आमजन भी अपने चहेते शीला दीक्षित का अंतिम दीदार कर सकते हैं।

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