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आखिर क्या है बुद्द के उन सात सप्ताहों का रहस्य जो ज्ञान प्राप्ति के बाद बिताए थे

गया: बिहार मुख्य तौर पर राजनीति और भोजपुरी सिनेमा की वजह से सुर्खियों में बने रहने वाले बिहार का लिट्टी-चोखा पूरी दुनिया में फेमस है। शिक्षा के क्षेत्र में टॉपर घोटाला हो या अलग-अलग प्रतियोगी परीक्षाओं में टॉप कर राज्य का नाम रौशन करने की प्रथा, इन सभी बातों को लेकर बिहार हमेशा चर्चाओं के केंद्र में रहा है। लेकिन बिहार में इन चीज़ों के अलावा और भी बहुत कुछ है, इसी वजह से यहां कई लोग घूमने जाते हैं। ऐसे में अगर आप भी बिहार घूमने का प्लान बना रहे तो आपको जरूर जानना चाहिए।

कार्यक्रम की पहली कड़ी में आपको बोध गया और यहां के विश्व विख्यात महाबोधि मंदिर से जुड़े कुछ रोचक तथ्यों से रूबरू करा रहे हैं। ताकि आप जब कभी भी बोध गया जाए तो इन चीजों पर गहनता से अध्यन करें।

बिहार की राजधानी पटना से करीब 127 किलोमीटर दूर बोध गया, बिहार के एक बड़े नगर गया के पास है। बिहार के बोध गांव से ही बौद्ध संस्कृति का जन्म हुआ, यहां का बोधगया तीर्थ स्थान इस बात का सबूत है। जहां बोधि पेड़ के नीचे बैठकर भगवान गौतम बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई। इसी वजह से इसे बोध गया कहते हैं।

बिहार में मंदिरों के शहर के नाम से मशहूर बोध गांव के लोगों की किस्‍मत उस दिन बदल गई जिस दिन एक राजकुमार ने सत्‍य की खोज के लिए अपने राजसिहासन को ठुकरा दिया। बुद्ध के ज्ञान की यह भूमि आज बौद्धों के सबसे बड़े तीर्थस्‍थल के रूप में प्रसिद्ध है। आज विश्‍व के हर धर्म के लोग यहां घूमने आते हैं।

पक्षियों की चहचहाट के बीच बुद्धम्-शरनम्-गच्‍छामि की हल्‍की ध्‍वनि अनोखी शांति प्रदान करती है। यहां का सबसे प्रसिद्ध मंदिर महाबोधि मंदिर' है। जहां विभिन्‍न धर्म तथा सम्‍प्रदाय के व्‍यक्‍ित इस मंदिर में आध्‍यात्मिक शांति की तलाश में आते हैं।

यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज में भी शामिल बोध गया, ये वहीं धरती है, जहां गौतम बुद्ध ने उस ज्ञान को प्राप्त किया, जो हर मानव जीवन का मुल उद्देशय है। बोध गया की धर्ती बौद्ध धर्म की अनुआइयों को लिए अत्यनंत महत्वपूर्ण है। और यही कराण है कि दुनिया भर के बौधिष्ट धर्म के लोग यहां आते हैं और उनके चरणों में ध्यान साधना करते हैं।

साल 2002 में इस शहर को यूनेस्को द्वारा इस शहर को विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया था। बोध गया का सबसे मुख्य आकर्षन है, महाबोधी मंदिर, ये मंदिर ठीक उसी जगह पर स्थित है, जहां गौतम बुद्ध ने इसापूर्व छठवीं सतावदी में ज्ञान प्राप्त किया था। इस मंदिर की बनावट सम्राट अशोक द्वारा स्थापित स्तूप के समान है। महाबोधी मंदिर परिषर तीसरी शताबदी बीसी में सम्राट अशोक द्वार निर्मित पहला मंदिर है। और वर्तमान मंदिर पांचवी, छठवी सतावदी से है। इस विहार में गौतम बुद्ध की बहुत बड़ी मुर्ती स्थापित है। यह मुर्दी पदमासन की मुद्रा में है। कहा जाता है कि ये मुर्ती ठीक उसी जगह स्थापित है, जहां गौतम बुद्ध सको ज्ञान बुद्धित्व प्राप्त हुआ था।

वर्तमान महाबोधी परिषर में 50 मीटर उंची भव्य मंदिर, वज्रासन, पवित्र बोधी वृक्ष, और बुद्ध के ज्ञान के ज्ञान के अन्य 6 पवित्र स्थल शामिल है। जो प्राचिन स्तूप से घिरे है। इनका रख-रखाव बड़े ही अच्छी तरह से किया जाता है। मुख्य मंदिर की दिवार की औसतन उंचाई 11 मीटर है, और ये भारतीय मंदिर वास्तुकला की शास्त्रिय शैली में बनाई गई है।

अगर आप इस मंदिर में जाएंगे तो आपको मंदिर के चारो ओर पत्थर की नकासीदार रेलिंग बनी नजर आएगी। ये रेलिंग बोधगया में प्राप्त सबसे पुराना अवशेश है। इस विहार परिषर के दक्षिण पूर्व दिशा में प्राकृतिक दृष्यों से भरा एक समृद्ध पार्क है, जहां बैद्ध विक्षु ज्ञान साधना करते हैं। आम लोगों के लिए बिना इजाजत जाना वर्जित है। इस विहार परिषर में उन सात स्थानों को भी चिन्हित किया है, जहां बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के बाद सात सप्ताह बिताए थे। यहां एक विशाव पीपल का वृक्ष है, जो मुख्य विहार के पीछे स्थित है। बुद्ध को इसी वृक्ष के नीचे ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। वर्तमान में जो वृक्ष है वो बौधी वृक्ष की पांचवी पीढ़ी है। मुख्य विहार के पीछे बुद्ध की लाल बावला पत्थर की सात फीट उंची बुद्ध की एक मुर्ती है। ये मुर्ती वज्रआसन की मुद्रा में है। इस मुर्ती के चारो और विभिन्न रंग के पताके लगे हैं, जो इस मुर्ती को एक विशिष्ट आकर्षण प्रादान करते हैं।

कहा जाता है कि तीसरी शताब्दी इसापूर्व में इस स्थान पर सम्राट ओशोक ने हीरे से बना राजसिंघासन लगवाया था और इसे पृथ्वी का नाभी केंद्र कहा जाता है। इस मुर्ती के आगे भूरे बलुए पत्थर बुद्ध के विशाल पद्चिन्ह लगे हैं। जिन्हें धर्मचक्र परिवर्तन का प्रतिक माना जाता है। बोध गया मंदिर के आस-पास कई देशों के मथ बने है। जैसे की भुटान, चीन, जापान, मयनमार, श्रीलंका ताइवान, तिब्त, वितनाम...इन मठों में कुछ बहुत ही पुराने है और कुछ नये है तो कुछ मठों का निर्माण कार्य जारी है। ये सारे मठ महाबोधी मंदिर पास ही बने हुए हैं।

यहां मौजूद तिबतन मठ बोध गया का सबसे बड़ा और पुराना मठ है। जो 1934 ई. में बनाया गया था।

बरमी विहार मथ, जो 1936 ई. में बनाया गया था। इस विहार में दो प्रार्थान कक्ष है। इसके अलावा यहां बुद्ध की एक विशाल प्रतिमा भी है।

इससे सटा ये मठ है थाइ मठ, इस मठ की छत की सोने से कलई की गई है। इस कारण इसे गोलडन मठ कहा जाता है। इस मथ की स्थापना थाइलैंड के राज परिवार ने बौध की स्थापना के 2500 साल पूरे होने के उपलक्ष में कराया था।

बोधगया घूमने का सबसे बढिया समय अप्रैल-मई में बुद्ध जयंती का है, जिसे राजकुमार सिद्धार्थ के जंमदिवस के रूप में मनाया जाता है।

बोध-गया घूमने के लिए दो दिन का समय पर्याप्‍त है। अगर आप एक रात यहां रूकते हैं तो एक दिन का समय भी प्रर्याप्‍त है। बोध-गया के पास ही एक शहर है गया। यहां भी कुछ पवित्र मंदिर हैं जिसे जरुर देखना चाहिए। इन दोनों गया को देखने के लिए कम से कम एक-एक दिन का समय देना चाहिए। एक अतिरिक्‍त एक दिन नालन्‍दा और राजगीर भ्रमण के लिए भी निकालिए।

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